Friday, March 30, 2018

मेरा क्या ही होगा

मेरा क्या ही होगा, 
जो बंदिशें उठ जाएंगी
जो पहरे छुट जाएंगे 
ये भागादौड़ी सी जो बिसरी है
सहसा जो ये रुक जाएगी 
मेरा क्या ही होगा 

अंधेरी रात फैली है
उजाले में अभी कुछ देरी है
दिया जलने से रातों के 
इरादों का ही बयां होगा
मेरा क्या ही होगा 

उषा, देखो वो, आती है
तिमिर कैसे मिटाती है 
रात के सपने अधूरे 
रह गए जो आंख मींचे 
स्वप्न की उन तरंगो से
फिर कभी संवाद होगा? 
मेरा क्या ही होगा

उषा, आशा भी लायी है
जिजीविषा जैसे बढ़ाई है 
नव-स्वप्न को साकार करने
रात्रि का प्रस्थान होगा 
मेरा उत्थान होगा

२/२४/२०१८

ए छद्म दिशा

ए छद्म दिशा! परिपेक्ष्य बता, विस्तार-पटल क्या देख लिया;
जो विस्तृत था, उसे और बढ़ा, परिपूर्ण सृजन को ढेल दिया| 

इस शौर्य-धैर्य की परिपाटी में, क्यों एक शक्ति को गौण किया; 
सौरज-धीरज रथ चाकों में, क्यों एक चक्र को क्षीण किया| 

अभिनन्दन की अभिलाषा में, जब वंदन को यूं त्यक्त किया; 
तब ह्रासवान अभिरुचि को, विजयवाहिनी ने यूं  व्यक्त किया| 

हे गणनायक! तू निश्चित ही अद्भुत पौरुष का धारी है;
जो पौरुष परिपूर्ण नहीं, किस विजय का वो अधिकारी है| 

हे रिपुसूदन! फिर आज तुझे एक आत्म-विवेचन करना है; 
इस छद्म दिशा में बढ़ना है, या आत्मनिष्ठ भू गढ़ना है| 

मन चंचल है, एक नयी मारीचिका वो रच लेगा; 
फिर तेरी अक्षमता को फूलों से वो ढक देगा| 

बस सुनी है, फूलों के साथ पली, संघर्षों की आत्मकथा; 
पर यथार्थ संघर्षों का, कांटे, कंकड़, खूं, और व्यथा| 

निर्णय तेरा, किस तृष्णा को आज समाहित करना है;
संघर्षों पे फूल रखना है, या अक्षमता को ढकना है| 

३/३/२०१८ 

मय

अब न वो दर न वो दरिया न वो दीवाने रहे ।
शम्मा में जलने वाले, अब न वो परवाने रहे ॥ 
बस ये मय है जिसने शम्मा जला रक्खी है । 
वरना न वो साकी न वो मयख़ाने रहे ॥

Saturday, February 2, 2013

ज़िन्दगी के लम्हे


(बचपन)
अतीत के वो हसीन लम्हे, वो सुकून वाले दुःख-हीन लम्हे।
है याद मुझको कुछ ज़रा से, वो बालपन के बेहतरीन लम्हे।।

वो मस्तियों के इल्म वाले, उल्लास से भरपूर लम्हे।
चाह कर भी न पकड़ आते, वो चुलबुले शौक़ीन लम्हे।

अमराइयों की छाँव वाले, मौसमों से अनभिज्ञ लम्हे।
कन्दुकों की क्रीड़ाओं  के आनंद से परिपूर्ण लम्हे।।


(किशोरावस्था)
धर पकड़ लेंगे ये दुनिया, बीतने दो चंद लम्हे।
ओज-पोषित, विश्वास-धारी, यथार्थ से दिग-भ्रंत लम्हे ।।

समुद्र से ठहराव वाले, लहर से गतिमान लम्हे।
लेते तरंगों का मज़ा, अनमने वो किशोर लम्हे।।

ध्येय-साधन में उलझते, असमंजसी, अनजान लम्हे।
ललकारते साहस को अक्सर, वो श्रम भरे बेबाक लम्हे।।


(युवावस्था)
दोस्तों के साथ वाले, ज़िन्दगी के जवान लम्हे।
घुमक्कड़ी का शौक पाले, वो जग समझते बलवान लम्हे।।

नव-क्रियाओं में उलझते, वो प्रयोग वाले अतिधीर लम्हे।
वो असफलताओं पर सिसकते, रून्धते से हताश लम्हे ।।

गर्त से वापस उभरते, शक्ति से परिपूर्ण लम्हे।
देते चुनौती, युद्ध करते, माँगते सम्मान लम्हे।।

फैसलों का बोझ ढोते, दायित्व से मजबूर लम्हे।
अभिव्यक्ति को सहसा तरसते, अटपटे, हैरान लम्हे।।

परिजनों के सुख में पुलकित, वो प्रफुल्लित संज्ञान लम्हे।
कर्त्तव्य-पूरक, मार्गदर्शक, सामर्थ्यशाली, अनुकूल लम्हे।।


(वृद्धावस्था)
ज़िन्दगी का करते विवेचन, कर रहे विश्राम लम्हे।
सार जीवन का समझते वानप्रस्थी मतिमान लम्हे।।

पूर्व-पग के वैभवों की याद के अविराम लम्हे।
आज के युग को बहिष्कृत कर रहे जड़वान लम्हे।।

काल-चक्रों में निहित वे, सत्यपोषित अभिज्ञान लम्हे।
त्याग-प्रेरित और समर्पित, संन्यास के सर्वज्ञ लम्हे ।।




चल रहे हैं निरंतर, साथ सबके, ये महान लम्हे।
है समेटे, अपने भीतर, ज़िन्दगी का सार लम्हे।।
झांक कर देखो ज़रा तो, मार्गदर्शक अतिश्रेष्ठ लम्हे।
युक्तिपूरक, सर्वव्यापी, ब्रह्मांड के धीमान लम्हे।।



वैभव श्रीवास्तव

Monday, January 9, 2012

तू हबीब है, तू रक़ीब है

तू हबीब है, तू रक़ीब है|
ये शहर वस्ल-ए-मजीद है||

ये जो इश्क है, ये हसीन है|
वो शक्श माह्ज़बीन है ||

ए उदू! तुझे हो ये इक्तिला|
मेरे पास ऐसा व़जीर है ||

तुझे देख कर मैं हूँ सोचता|
कैसा प्यारा मेरा नसीब है ||


वैभव श्रीवास्तव

Saturday, December 31, 2011

एक बरस बीत गया

एक बरस बीत गया, एक बरस बीत गया

शीत की रैन से, शीत की रैन तक,
मौसम अनेक, बीच में छोड़ गया,
एक बरस बीत गया|

माला हरी मिली कहीं,
तो लाल रंग कहीं उड़ेल गया,
एक बरस बीत गया|

अकर्मण्यता भरे दिनों में, राह तो प्रशस्त कर,
कर्म से भरे दिनों में, जिजीविशा झंझोर गया,
एक बरस बीत गया |

आदि है नए बरस का, रैन से फिर रैन तक,
दिवस कहो तो ये दिवस है,
एक दिवस बीत गया, एक दिवस बीत गया|

वैभव श्रीवास्तव

Wednesday, July 29, 2009

मंथन

अंतर्मन का आवर्त मंथन,
विस्मित करता यह स्पंदन|
एकांत मनस का एकाकी चिंतन,
लगा गूंजने कैसा वंदन ||

विह्वल चित्त का आत्मनिरीक्षण,
जीवन पथ का पुनर्विवेचन |
सिद्धांतों की एक और परीक्षा,
उर में स्थित प्रबल अनिच्छा||

उद्गम तक एक और समीक्षा,
अनुचितोचित की पुनार्भीप्सा|
पथ भटकी एक खोज पुरानी,
ढूँढ रहा फिर कोई निशानी ||

चक्रव्यूह एक घिरा अनोखा,
नही पार्थ तू , खा गया धोखा |
वीरगति की परवश इच्छा ,
कृत्रिम सही पर न हो भिक्षा ||

गूँज रही शंखों की वाणी,
छोड़ बाट और छोड़ निशानी|
महारथी ! तू युद्ध प्रखर हो,
यही कह गए माधव, प्राणी ||

वैभव श्रीवास्तव