फिर चला वही कलकल का स्वर,
विस्पंदित मनस चित्त व्याकुल,
तट पार खडा वह कलरव हर,
पर भंवर रचित यह मायाजल,
उद्धत लहरो से पटी धरा,
तू उन्मद पर खडा रहा,
थी ज्वार अपेक्षित या भंवर,
करता वन्दन तू फिर डरकर,
फिर किसी भंवर मे फसकर,
अभिलाषित गन्तव्य दृष्टिगोचर,
फिर चला ढूढने पथदर्शक,
सब मिले घूमते पृथ्वी सम,
असमन्जस मे हूँ अब खडा हुआ,
क्यों ना उडकर मै गया वहा,
हे परमेश्वर !तू ही बता,
क्यों ना नभचर मै बना यहाँ,
है सर्वज्ञ कथित चराचर सब,
क्यों फसे इसी चक्र मे तब,
उस प्रशस्ति मार्ग का दीद नही,
ले जाये इन्हे जो उस तट पर,
हे जादूगर! तू है कहाँ,
तू ही बन सकता है पथ दर्शक
सम्पूर्ण जगत का तारण कर,
कहलाएगा तू मनुपूरक,
कहलाएगा तू मनुपूरक|
वैभव श्रीवास्तव
Monday, October 29, 2007
Saturday, October 27, 2007
जिजीविशा
वो आफताब गया साहिल मे जब,
भर गया समा हलचल मे तब,
एक ओर दिखा तूफान जहाँ,
एक ओर भरा अन्दर ही सब,
फिर उठी तूफान की हिल्लोरे,
दिल भरा रहा अन्दर ही तब,
कोई दिखा गगनचुम्बी होता,
कोई आतिशय धरागामी होता,
तूफान थमेगा एक दिन जब,
धरातल पे होगा सबकुछ तब,
अब कौन धरागामी है यहाँ,
अब कौन गगन चुम्बी है यहाँ,
कौन स्वयं से ही है व्याकुल,
कौन स्वयं से व्यथित यहाँ.
वैभव श्रीवास्तव
भर गया समा हलचल मे तब,
एक ओर दिखा तूफान जहाँ,
एक ओर भरा अन्दर ही सब,
फिर उठी तूफान की हिल्लोरे,
दिल भरा रहा अन्दर ही तब,
कोई दिखा गगनचुम्बी होता,
कोई आतिशय धरागामी होता,
तूफान थमेगा एक दिन जब,
धरातल पे होगा सबकुछ तब,
अब कौन धरागामी है यहाँ,
अब कौन गगन चुम्बी है यहाँ,
कौन स्वयं से ही है व्याकुल,
कौन स्वयं से व्यथित यहाँ.
वैभव श्रीवास्तव
Friday, October 26, 2007
जीवन दर्शन
जीवन आपाधापी की कल्पना है,
तू तो बस एक भंवर मे फना है,
साहिल पे पहुंचेगे ये तो तमन्ना है,
पर किसको पता की रस्ता कितना घना है|
वैभव श्रीवास्तव
तू तो बस एक भंवर मे फना है,
साहिल पे पहुंचेगे ये तो तमन्ना है,
पर किसको पता की रस्ता कितना घना है|
वैभव श्रीवास्तव
Monday, October 22, 2007
पराचैतन्य
रस्में जहाँ से बाबस्ता हूँ,
मै तो बस एक रस्ता हूँ,
कोई आया और कोई चला गया,
मै मन्जर तकता खड़ा रहा|
वैभव श्रीवास्तव
मै तो बस एक रस्ता हूँ,
कोई आया और कोई चला गया,
मै मन्जर तकता खड़ा रहा|
वैभव श्रीवास्तव
एक नया सहरा
उस जनाजे मे रुक्सत हुआ तसव्वुर तेरा,
जग ने खोया सुखन्वर-ए-सहरा,
मुड़ के देखा वही घर, वही शख्स, वही रिश्ते है,
मुझको मिल गया एक नया सहरा|
वैभव श्रीवास्तव
जग ने खोया सुखन्वर-ए-सहरा,
मुड़ के देखा वही घर, वही शख्स, वही रिश्ते है,
मुझको मिल गया एक नया सहरा|
वैभव श्रीवास्तव
आपाधापी
दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिज्रा मे भी सुकून होता,
गर अपना भी कोई गिरफ्ते रुकून होता,
मंजिले आफताब पे मुमकिन है तू पहुँचा होता,
तेरा साया भी काफिर ना तेरे हासिल होता|
वैभव श्रीवास्तव
गर अपना भी कोई गिरफ्ते रुकून होता,
मंजिले आफताब पे मुमकिन है तू पहुँचा होता,
तेरा साया भी काफिर ना तेरे हासिल होता|
वैभव श्रीवास्तव
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