एक पेड़ खड़ा चौराहे पे ,
मन ही मन ये सोच रहा |
जड़ हूँ पर मैं अच्छा हूँ,
इस आपाधापी से विरक्ता हूँ ||
एक आत्मनिष्ठ व्यक्तित्व लिए,
सृष्टि का पोषण करता है |
तू देख मनुज बस ख़ुद के लिए,
क्या उहापोह तू करता है ||
अपभ्रंश शान्ति के वियोग में ,
व्याकुल सा तू फिरता है |
पर देख यहाँ ये एकात्त चित्त हो,
मधुर कोलाहल करता है ||
तू उद्भव की उपरि सीमा पे ,
क्या - क्या न करता है |
पर सोच ज़रा इस चराचर में,
है कौन जो व्यथित न रहता है ||
जड़ता एक अभिशाप नही,
आत्मचैतन्य की जननी है|
सब देख चुके सर्वज्ञ मनुज की,
निश्चय ही यह करनी है ||
वैभव श्रीवास्तव
Tuesday, December 16, 2008
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