एक घर यहाँ, एक घर वहां ,
एक आशियान, एक है मकान|
एक अट्टालिका, फिर भी वीरान ,
एक लघु बहुत, जन की खदान ||
एक ओर बिखरी शान्ति है ,
एक ओर कोलाहल तमाम |
ढूँढा सभी ने आशियान ,
मिलता कई को बस मकान ||
बढती गई सबकी दुकान ,
बदला न घर में वो मकान |
एक घर यहाँ , एक घर वहां ,
एक आशियान, एक है मकान||
वैभव श्रीवास्तव
Saturday, January 3, 2009
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