अंतर्मन का आवर्त मंथन,
विस्मित करता यह स्पंदन|
एकांत मनस का एकाकी चिंतन,
लगा गूंजने कैसा वंदन ||
विह्वल चित्त का आत्मनिरीक्षण,
जीवन पथ का पुनर्विवेचन |
सिद्धांतों की एक और परीक्षा,
उर में स्थित प्रबल अनिच्छा||
उद्गम तक एक और समीक्षा,
अनुचितोचित की पुनार्भीप्सा|
पथ भटकी एक खोज पुरानी,
ढूँढ रहा फिर कोई निशानी ||
चक्रव्यूह एक घिरा अनोखा,
नही पार्थ तू , खा गया धोखा |
वीरगति की परवश इच्छा ,
कृत्रिम सही पर न हो भिक्षा ||
गूँज रही शंखों की वाणी,
छोड़ बाट और छोड़ निशानी|
महारथी ! तू युद्ध प्रखर हो,
यही कह गए माधव, प्राणी ||
वैभव श्रीवास्तव
Wednesday, July 29, 2009
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