Wednesday, July 29, 2009

मंथन

अंतर्मन का आवर्त मंथन,
विस्मित करता यह स्पंदन|
एकांत मनस का एकाकी चिंतन,
लगा गूंजने कैसा वंदन ||

विह्वल चित्त का आत्मनिरीक्षण,
जीवन पथ का पुनर्विवेचन |
सिद्धांतों की एक और परीक्षा,
उर में स्थित प्रबल अनिच्छा||

उद्गम तक एक और समीक्षा,
अनुचितोचित की पुनार्भीप्सा|
पथ भटकी एक खोज पुरानी,
ढूँढ रहा फिर कोई निशानी ||

चक्रव्यूह एक घिरा अनोखा,
नही पार्थ तू , खा गया धोखा |
वीरगति की परवश इच्छा ,
कृत्रिम सही पर न हो भिक्षा ||

गूँज रही शंखों की वाणी,
छोड़ बाट और छोड़ निशानी|
महारथी ! तू युद्ध प्रखर हो,
यही कह गए माधव, प्राणी ||

वैभव श्रीवास्तव