रस्में जहाँ से बाबस्ता हूँ,
मै तो बस एक रस्ता हूँ,
कोई आया और कोई चला गया,
मै मन्जर तकता खड़ा रहा|
वैभव श्रीवास्तव
Monday, October 22, 2007
एक नया सहरा
उस जनाजे मे रुक्सत हुआ तसव्वुर तेरा,
जग ने खोया सुखन्वर-ए-सहरा,
मुड़ के देखा वही घर, वही शख्स, वही रिश्ते है,
मुझको मिल गया एक नया सहरा|
वैभव श्रीवास्तव
जग ने खोया सुखन्वर-ए-सहरा,
मुड़ के देखा वही घर, वही शख्स, वही रिश्ते है,
मुझको मिल गया एक नया सहरा|
वैभव श्रीवास्तव
आपाधापी
दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिज्रा मे भी सुकून होता,
गर अपना भी कोई गिरफ्ते रुकून होता,
मंजिले आफताब पे मुमकिन है तू पहुँचा होता,
तेरा साया भी काफिर ना तेरे हासिल होता|
वैभव श्रीवास्तव
गर अपना भी कोई गिरफ्ते रुकून होता,
मंजिले आफताब पे मुमकिन है तू पहुँचा होता,
तेरा साया भी काफिर ना तेरे हासिल होता|
वैभव श्रीवास्तव
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