दश्त-ए-तन्हाई-ए-हिज्रा मे भी सुकून होता, गर अपना भी कोई गिरफ्ते रुकून होता, मंजिले आफताब पे मुमकिन है तू पहुँचा होता, तेरा साया भी काफिर ना तेरे हासिल होता|
एक लंबे समय से मुझे कविताएं और गज़ले पढ़ने का शौक रहा है| पिछले कुछ सालों में मैंने काफी समय के बाद फिर से कविता लिखना शुरू किया | ये ब्लॉग मेरी इन नवीन कविताओं का संग्रह है |
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