अथाह जलध, ढलता किरणेश,
फिर क्यों तपता यह परिवेश,
कोई किरण न आशा जगा सकी,
या मारीचिका दुश्वार हुई,
आवर्तो के विषम जाल मे,
या वैयिक्ता गुमनाम हुई,
उत्कृष्ट जलध की मृदु समीर भी,
शीतलता ना जगा सकी,
वशीकरण की हर कला भी,
विकृत थी, बेकार रही,
थक कर तू मत बैठ यहा,
अपना व्यक्तित्व उज्ज्वलित कर,
मत बन प्रतिबिम्ब चन्द्रमा सम,
सूरज सम जग का सृष्टा बन,
तू ढूँढ स्वयम को खुद मे अब,
अन्तर्मुख मत अब रोक इसे,
तेज स्वयं का विकिरित कर,
परिवेश स्वयं का शीतल कर|
वैभव श्रीवास्तव
Tuesday, January 1, 2008
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