Tuesday, January 1, 2008

अन्तर्द्वन्द्व

अथाह जलध, ढलता किरणेश,
फिर क्यों तपता यह परिवेश,
कोई किरण न आशा जगा सकी,
या मारीचिका दुश्वार हुई,
आवर्तो के विषम जाल मे,
या वैयिक्ता गुमनाम हुई,
उत्कृष्ट जलध की मृदु समीर भी,
शीतलता ना जगा सकी,
वशीकरण की हर कला भी,
विकृत थी, बेकार रही,
थक कर तू मत बैठ यहा,
अपना व्यक्तित्व उज्ज्वलित कर,
मत बन प्रतिबिम्ब चन्द्रमा सम,
सूरज सम जग का सृष्टा बन,
तू ढूँढ स्वयम को खुद मे अब,
अन्तर्मुख मत अब रोक इसे,
तेज स्वयं का विकिरित कर,
परिवेश स्वयं का शीतल कर|

वैभव श्रीवास्तव

3 comments:

~GC said...

bhaiya for the sake of lesser mortals like us jara sa isse apni bhasha mein samjhao kya hai yeh ???

Anonymous said...

Why the spelling mistakes like utkrisht, mridu? Which font is this?

वैभव said...

the font i had.. was not putting ri matra... i have it now but dint get time to correct it [:-)]