Friday, March 30, 2018

ए छद्म दिशा

ए छद्म दिशा! परिपेक्ष्य बता, विस्तार-पटल क्या देख लिया;
जो विस्तृत था, उसे और बढ़ा, परिपूर्ण सृजन को ढेल दिया| 

इस शौर्य-धैर्य की परिपाटी में, क्यों एक शक्ति को गौण किया; 
सौरज-धीरज रथ चाकों में, क्यों एक चक्र को क्षीण किया| 

अभिनन्दन की अभिलाषा में, जब वंदन को यूं त्यक्त किया; 
तब ह्रासवान अभिरुचि को, विजयवाहिनी ने यूं  व्यक्त किया| 

हे गणनायक! तू निश्चित ही अद्भुत पौरुष का धारी है;
जो पौरुष परिपूर्ण नहीं, किस विजय का वो अधिकारी है| 

हे रिपुसूदन! फिर आज तुझे एक आत्म-विवेचन करना है; 
इस छद्म दिशा में बढ़ना है, या आत्मनिष्ठ भू गढ़ना है| 

मन चंचल है, एक नयी मारीचिका वो रच लेगा; 
फिर तेरी अक्षमता को फूलों से वो ढक देगा| 

बस सुनी है, फूलों के साथ पली, संघर्षों की आत्मकथा; 
पर यथार्थ संघर्षों का, कांटे, कंकड़, खूं, और व्यथा| 

निर्णय तेरा, किस तृष्णा को आज समाहित करना है;
संघर्षों पे फूल रखना है, या अक्षमता को ढकना है| 

३/३/२०१८ 

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