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मेरी कलम से
Friday, March 30, 2018
मय
अब न वो दर न वो दरिया न वो दीवाने रहे ।
शम्मा में जलने वाले, अब न वो परवाने रहे ॥
बस ये मय है जिसने शम्मा जला रक्खी है ।
वरना न वो साकी न वो मयख़ाने रहे ॥
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मय
ए छद्म दिशा
मेरा क्या ही होगा
About Me
वैभव
एक लंबे समय से मुझे कविताएं और गज़ले पढ़ने का शौक रहा है| पिछले कुछ सालों में मैंने काफी समय के बाद फिर से कविता लिखना शुरू किया | ये ब्लॉग मेरी इन नवीन कविताओं का संग्रह है |
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