एक बरस बीत गया, एक बरस बीत गया
शीत की रैन से, शीत की रैन तक,
मौसम अनेक, बीच में छोड़ गया,
एक बरस बीत गया|
माला हरी मिली कहीं,
तो लाल रंग कहीं उड़ेल गया,
एक बरस बीत गया|
अकर्मण्यता भरे दिनों में, राह तो प्रशस्त कर,
कर्म से भरे दिनों में, जिजीविशा झंझोर गया,
एक बरस बीत गया |
आदि है नए बरस का, रैन से फिर रैन तक,
दिवस कहो तो ये दिवस है,
एक दिवस बीत गया, एक दिवस बीत गया|
वैभव श्रीवास्तव
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