Monday, October 29, 2007

मनुपूरक

फिर चला वही कलकल का स्वर,
विस्पंदित मनस चित्त व्याकुल,
तट पार खडा वह कलरव हर,
पर भंवर रचित यह मायाजल,
उद्धत लहरो से पटी धरा,
तू उन्मद पर खडा रहा,
थी ज्वार अपेक्षित या भंवर,
करता वन्दन तू फिर डरकर,
फिर किसी भंवर मे फसकर,
अभिलाषित गन्तव्य दृष्टिगोचर,
फिर चला ढूढने पथदर्शक,
सब मिले घूमते पृथ्वी सम,
असमन्जस मे हूँ अब खडा हुआ,
क्यों ना उडकर मै गया वहा,
हे परमेश्वर !तू ही बता,
क्यों ना नभचर मै बना यहाँ,
है सर्वज्ञ कथित चराचर सब,
क्यों फसे इसी चक्र मे तब,
उस प्रशस्ति मार्ग का दीद नही,
ले जाये इन्हे जो उस तट पर,
हे जादूगर! तू है कहाँ,
तू ही बन सकता है पथ दर्शक
सम्पूर्ण जगत का तारण कर,
कहलाएगा तू मनुपूरक,
कहलाएगा तू मनुपूरक|

वैभव श्रीवास्तव

3 comments:

Unknown said...

Good one but difficult to read in Hinglish

rajeev said...

800/800 in hindi verbal

आलोक कुमार said...

जादूगर आयेगा!!...अच्छा लगा आपका हिन्दी ब्लोग देखकर :)